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समाज का मार्ग दर्शन करती है डा. क्षेम की कविताएं: कृपाशंकर सिंह

 

👉साहित्य समाज का दर्पण होता है: जिलाधिकारी

👉स्वतंत्रता आंदोलन में रहा कवियों का योगदान: पुलिस अधीक्षक

👉हिंदी साहित्य में सशक्त हस्ताक्षर हैं डा. क्षेम: ज्ञानप्रकाश सिंह

जौनपुर। साहित्य वाचस्पति डा. श्रीपाल सिंह क्षेम की कविताएं मानवता का संदेश देती हैं। जिसने भी उनकी कविताओं को गंभीरतापूर्वक पढ़ा या सुना होगा उसने अपने जीवन में सही रास्ता पकड़ा होगा। उक्त बातें महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्यमंत्री कृपाशंकर सिंह ने डा. श्रीपाल सिंह क्षेम के 102वें जन्म दिवस समारोह पर आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप मंे व्यक्त किया। उन्होंने कहाकि निंदिया घरों से देखो धूपिया मुंडेरा है। जभी से जगो रे भाई तभी से सबेरा है।

 क्षेम जी की कविता आज भी उनका मार्गदर्शन करती है। विशिष्ट अतिथि के रूप में जिलाधिकारी रवींद्र कुमार मांदड़ ने कहाकि साहित्य समाज का दर्पण होता है। इसमें कवि अपने समय की परिस्थितियों का चित्रण करता है। समारोह के दूसरे विशिष्ट अतिथि एसपी डा. अजय पाल शर्मा ने कहाकि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। साहित्य में समाज को दिशा देने की शक्ति होती है। आज भी डा. क्षेम अपनी रचनाओं के माध्यम से देश के लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ भाजपा नेता एवं उद्योगपति ज्ञानप्रकाश सिंह ने डा. क्षेम को हिंदी साहित्य के इतिहास में एक सशक्त हस्ताक्षर बताया। उन्होंने एक पल ही जिओ फूल बनकर जिओ तथा मद्माता पपिहरा बोले रे जैसी अनेक कविताओं का उद्धरण प्रस्तुत किया। संचालन डा. मधुकर तिवारी ने किया। समारोह के दूसरे चक्र में पं. रामकृष्ण त्रिपाठी की अध्यक्षता में भव्य कवि सम्मेलन मुशायरे का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन का शुभारंभ कवयित्री सुदामा पांडेय सौरभ ने- हमार अंगना मइया धीरे से अइह। बइठि के अगनवां में बीना बजइह।। सरस्वती वंदना से किया। इसके बाद आजमगढ़ से पधारे गीतकार भालचन्द्र त्रिपाठी ने- तुम सलीके से कह गये होते। हम भी हर बात सह गये होते।। कोई बैठा हमारी छांव में है, वरना हम कब के ढह गये होते।। जैसी रचनाओं से वाहवाही लूटी। शायर अंसार जौनपुरी ने- सिर्फ इक शोला बयानी के सबब उठा धुआं, मुद्दआ इक घर जलाकर रहबरी को मिल गया। गजल सुनाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। वाराणसी से पधारे हास्य कवि नागेश शाण्डिल्य ने- हम दोनों पति-पत्नी है यह बात है सही, परंतु एक दूसरे के नहीं।। अंत में प्रतापगढ़ की धरती से आये ओज के कवि डा.रणजीत सिंह ने- मेरे देश के सैनिक ही मेरी कविता के नामय है। हम ऐसे वीर जवानों की पौरूष गाथा के गायक है।। जैसी रचनाओं से राष्ट्रीय चेतना जागृत किया। संचालन सभाजीत द्विवेदी प्रखर, आंगन्तुकों का अभिवादन ओमप्रकाश सिंह तथा आभार ज्ञापन शशिमोहन सिंह क्षेम ने किया। उक्त अवसर पर वीरेन्द्र सिंह एडवोकेट, दुष्यंत सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह, रवीन्द्र प्रताप सिंह, डा. मनोज मिश्र, हरिवंश मिश्र, रामदयल द्विवेदी, पत्रकार जेड हुसैन बाबू आदि मौजूद रहे।

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जेड हुसैन (बाबू)

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