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JAUNPUR NEWS 23 साल पुराने जानलेवा हमले के केस में नया मोड़ : धनंजय सिंह बनाम राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया

👉वाराणसी में 2002 के एके-47 हमले से लेकर 2025 की बरी तक, और अब सुप्रीम कोर्ट की दखल सवालों के घेरे में अभियोजन की भूमिका

जौनपुर। उत्तर प्रदेश की राजनीति और आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील और बहुचर्चित मामला एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। वर्ष 2002 में तत्कालीन विधायक धनंजय सिंह पर वाराणसी में हुए जानलेवा हमले से संबंधित केस में अब सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए अपील स्वीकार कर ली है और सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। यह घटनाक्रम न केवल इस केस की दिशा बदल सकता है, बल्कि पीड़ितों के अपील अधिकार को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है।वर्ष 2002 में वाराणसी में धनंजय सिंह पर उस समय जानलेवा हमला किया गया था, जब वे सक्रिय राजनीति में थे। आरोप था कि हमलावरों ने एके-47 जैसे अत्याधुनिक स्वचालित हथियार का इस्तेमाल किया। यह घटना उस दौर में कानून-व्यवस्था और संगठित अपराध के बढ़ते प्रभाव का प्रतीक मानी गई थी। मामले में कुख्यात गैंगस्टर अभय सिंह और उसके गिरोह के नाम सामने आए थे।जांच के दौरान वर्ष 2003 में यूपी पुलिस ने अभय सिंह (जिसे गैंग लीडर बताया गया) के पक्ष में फाइनल रिपोर्ट (एफआर) दाखिल कर दी, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इस कदम को लेकर उस समय भी सवाल उठे थे कि क्या विवेचना निष्पक्ष और प्रभावी रही।लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद वर्ष 2025 में वाराणसी की गैंगस्टर कोर्ट ने इस मामले में चार आरोपियों को बरी कर दिया। बरी किए गए आरोपियों में संदीप सिंह (अभय सिंह का साला), विनोद सिंह, संजय रघुवंशी, सतेंद्र सिंह उर्फ बब्लू शामिल हैं। अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन की कमजोरियों और साक्ष्यों की कमी को आधार बताया।

इस फैसले के बाद कानूनी रूप से राज्य सरकार / अभियोजन पक्ष को उच्च न्यायालय में अपील दायर करनी थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बाद धनंजय सिंह ने स्वयं उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि उन्हें बरी के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार नहीं है।

उच्च न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देते हुए धनंजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस अपील को स्वीकार कर लिया है और सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इससे यह मामला एक बार फिर जीवित हो गया है।इस पूरे प्रकरण ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं, यदि अभियोजन पक्ष अपील नहीं करता, तो क्या पीड़ित न्याय के लिए पूरी तरह असहाय हो जाता है? क्या राज्य की निष्क्रियता पर न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है? क्या गंभीर अपराधों में तकनीकी आधार पर न्याय समाप्त हो जाना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अब सिर्फ इस केस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह तय करेगी कि पीड़ित के अधिकार, राज्य की भूमिका और न्याय की अवधारणा को किस तरह परिभाषित किया जाएगा। 23 साल पुराने इस मामले में शीर्ष अदालत का फैसला भविष्य के कई मामलों के लिए नज़ीर बन सकता है। फिलहाल, पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि वाराणसी के इस पुराने लेकिन गंभीर मामले में न्याय की प्रक्रिया को एक नई दिशा मिलेगी या नहीं।



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जेड हुसैन (बाबू)

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