जौनपुर। कंस के आमंत्रण पर जब अकरूर कृष्ण को रथ पर बैठाकर मथुरा ले जाने लगे तो गोप-गोपी सभी शोकाकुल हो गये। किसी तरह वृंदावन के लोगों को समझा बुझाकर कृष्ण बलराम मथुरा की ओर चल पड़े। कंस ने कृष्ण को मार डालने के लिए कुवलयापीड नामक हाथी के नगर के मुख्य द्वार पर खड़ा किया था। कुवलयापीड हाथी जब कृष्ण की ओर दौड़ा तो उन्होंने उसका सूड़ पकड़ लिया। उसे घुमाकर ऐसा पटका कि उसका प्राणान्त हो गया। कृष्ण और बलराम ने उसके विशाल दांतों को उखाड़ लिया और आगे बढ़े जहां कंस ने कृष्ण-बलराम को मार डालने के लिए चाड़ूर, मुष्टिक जैसे कई पहलवानों को बुला रखा था। कृष्ण और बलराम ने सभी पहलवानों का वध कर डाला। अंत में कृष्ण ने कंस के बालों पकड़कर उसकी गरदन को तलवार से अलग कर दिया। उन्होंने कारागार में बंद अपने माता पिता को बंधन मुक्त किया और महाराज उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा बना दिया। इसके पूर्व कथा व्यास ने रासलीला का मनोरम एंव तात्विक विवेचना प्रस्तुत की। गोपी गीत सुनकर उन्होंने श्रद्धालुओं के नेत्र सजल कर दिए।
