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LUCKNOW NEWS एक विद्यार्थी से जामिया के रजिस्ट्रार तक : प्रो. एम. डी. महताब आलम रिजवी की यात्रा

डॉक्टर मोहम्मद सैफी अनवर

लखनऊ/जौनपुर। कुछ जीवन-कथाएँ केवल पढ़ने के लिए नहीं होतीं, वे रास्ता दिखाने के लिए होती हैं। वे यह बताती हैं कि मेहनत अगर लगातार हो, ज्ञान अगर गहरा हो, सोच अगर साफ हो और जिम्मेदारी निभाने का भाव सच्चा हो, तो व्यक्ति धीरे-धीरे साधारण शुरुआत से असाधारण ऊँचाई तक पहुँच सकता है। प्रो. एम. डी. महताब आलम रिजवी की यात्रा ऐसी ही प्रेरक यात्रा है। एक विद्यार्थी से शोधार्थी, शोधार्थी से विद्वान, विद्वान से शिक्षक, शिक्षक से शोध-मार्गदर्शक, केंद्र निदेशक और फिर जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे ऐतिहासिक केंद्रीय विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार तक पहुँचना अपने-आप में मेहनत, अनुशासन और ज्ञान की एक सुंदर कहानी है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया केवल एक विश्वविद्यालय नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और बौद्धिक परंपरा की एक ऐतिहासिक धरोहर है। ऐसे संस्थान में रजिस्ट्रार का पद संभालना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय की व्यवस्था, अनुशासन, समन्वय और भविष्य से जुड़ा हुआ दायित्व है। इस पद पर बैठा व्यक्ति केवल फाइलों और आदेशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों, विभागों, केंद्रों और प्रशासनिक इकाइयों को एक व्यवस्थित धारा में जोड़ने का कार्य करता है। प्रो. रिजवी इस जिम्मेदारी को अपनी गंभीर कार्यशैली, शैक्षणिक अनुभव और प्रशासनिक समझ के साथ निभाते दिखाई देते हैं।

प्रो. रिजवी की शैक्षणिक यात्रा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ी रही है। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातक, स्नातकोत्तर और बाद में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। यह केवल डिग्रियाँ प्राप्त करने की यात्रा नहीं थी, बल्कि विषय को गहराई से समझने, समाज और विश्व राजनीति को गंभीर दृष्टि से देखने और ज्ञान को जीवन का आधार बनाने की यात्रा थी। राजनीति विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय संबंध, विदेश नीति, सुरक्षा अध्ययन, पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका, भारत-ईरान संबंध, ऊर्जा सुरक्षा तथा शांति और संघर्ष समाधान जैसे विषयों पर उनकी गहरी पकड़ ने उन्हें एक गंभीर और व्यापक दृष्टि वाले विद्वान के रूप में स्थापित किया। उनके जीवन-वृत्त में 20 वर्षों से अधिक के अध्यापन और शोध अनुभव का उल्लेख है।

उनके विद्यार्थी जीवन की एक विशेष बात यह भी रही कि वे केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में वे सेमिनार सचिव रहे, प्रॉक्टोरियल मॉनिटर रहे, एन.सी.सी. के ‘बी’ और ‘सी’ प्रमाणपत्र प्राप्त किए, एन.एस.एस. से जुड़े और इलेक्ट्रॉनिक डाटा प्रोसेसिंग में एक वर्षीय डिप्लोमा भी पूरा किया। ये अनुभव उनके व्यक्तित्व की नींव बने। छात्र जीवन में ही उन्होंने नेतृत्व, अनुशासन, संगठन और सामाजिक भागीदारी को करीब से समझा। यही कारण है कि आगे चलकर जब वे बड़े शैक्षणिक और प्रशासनिक दायित्वों तक पहुँचे, तो उनके भीतर विद्यार्थी-जीवन की संवेदनशीलता और प्रशासन की गंभीरता दोनों साथ-साथ दिखाई दीं।

प्रो. रिजवी की यात्रा सीधे किसी बड़े पद से शुरू नहीं होती। उन्होंने छोटे-छोटे अनुभवों से अपने व्यक्तित्व को गढ़ा। बाल श्रम परियोजना में गणनाकर्मी के रूप में कार्य करना, चुनाव सर्वेक्षण में शोध विश्लेषक के रूप में काम करना और छात्र जीवन में जिम्मेदार भूमिकाएँ निभाना—ये सब बताते हैं कि उनका सफर जमीन से जुड़ा हुआ रहा है। यही जमीन से जुड़ाव किसी भी व्यक्ति को बड़ा बनाता है, क्योंकि जो व्यक्ति नीचे से व्यवस्था को समझता है, वही ऊपर जाकर बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।

साल 2005 में उन्हें नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीन मूर्ति भवन, नई दिल्ली से डॉक्टोरल अध्ययन के लिए प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। इसी वर्ष उन्हें भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद से भारत के पुस्तकालयों के अध्ययन हेतु शोध अनुदान भी मिला। ये उपलब्धियाँ यह प्रमाणित करती हैं कि उनकी प्रतिभा को प्रारंभिक दौर में ही प्रतिष्ठित संस्थानों ने पहचाना। किसी शोधार्थी के लिए ऐसी मान्यता केवल सम्मान नहीं होती, बल्कि आगे बढ़ने का विश्वास भी होती है।

जामिया से जुड़ने से पहले प्रो. रिजवी ने नई दिल्ली स्थित रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान में कार्य किया। यह भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय से जुड़ा एक प्रतिष्ठित शोध संस्थान और विचार मंच माना जाता है। वहाँ उन्होंने ईरान, पश्चिम एशिया, खाड़ी देशों, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, ईरान-चीन संबंध, ऊर्जा सुरक्षा, भारत की रणनीतिक साझेदारियाँ और शांति तथा संघर्ष से जुड़े विषयों पर गंभीर अध्ययन किया। यह अनुभव उनके व्यक्तित्व का मजबूत अध्याय बना। इससे वे केवल कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं रहे, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों को गहराई से समझने वाले शोधकर्ता के रूप में सामने आए।

उनकी विद्वता का विस्तार उनके लेखन में भी साफ दिखाई देता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों, ईरान, पश्चिम एशिया, भारत-ईरान संबंध, तेल राजनीति, परमाणु नीति, सुरक्षा अध्ययन और वैश्विक कूटनीति जैसे विषयों पर पुस्तकें, शोध लेख, पुस्तक अध्याय, नीति संबंधी लेख और समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण लेख लिखे। ईरान की राजनीतिक और सैन्य संस्थाओं पर उनका अध्ययन उनकी गहरी शोध-दृष्टि का प्रमाण है। इसके साथ ही हिमालय और हिंद महासागर क्षेत्र से जुड़े सांस्कृतिक, समुद्री और रणनीतिक संबंधों पर उनका संपादन कार्य उनकी व्यापक सोच को सामने लाता है।

प्रो. रिजवी की पहचान केवल भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने ईरान, कतर, सऊदी अरब और नेपाल जैसे देशों में शैक्षणिक तथा रणनीतिक चर्चाओं में भाग लिया। उन्होंने भारत-ईरान संबंध, खाड़ी सुरक्षा, भारत-कतर संबंध, भारत और खाड़ी देशों के रक्षा संबंध तथा शांति और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। तेहरान में नव-नियुक्त ईरानी राजनयिकों को भारत-ईरान संबंधों पर व्याख्यान देना अपने-आप में उनके ज्ञान, अनुभव और विश्वसनीयता का बड़ा प्रमाण है।

उन्होंने फारसी भाषा का अध्ययन भी किया। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि पश्चिम एशिया और ईरान जैसे विषयों पर गंभीर अध्ययन करने वाला विद्वान जब वहाँ की भाषा और संस्कृति को भी समझता है, तो उसकी दृष्टि और अधिक गहरी हो जाती है। प्रो. रिजवी अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, फारसी और अरबी जैसी भाषाओं से परिचित हैं। भाषा उनके लिए केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राजनीति को समझने का रास्ता रही है।

फरवरी 2017 में प्रो. रिजवी जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़े। जामिया में उनका आगमन केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं हुआ, बल्कि एक ऐसे विद्वान के रूप में हुआ जो अपने साथ शोध की गहराई, नीति की समझ, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और शैक्षणिक गंभीरता लेकर आया था। उन्होंने नेल्सन मंडेला शांति और संघर्ष समाधान केंद्र में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया और बाद में इसी केंद्र के निदेशक बने। यह केंद्र जामिया की उस शैक्षणिक परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसमें शांति, संवाद, न्याय और संघर्ष समाधान को समाज के भविष्य से जोड़ा जाता है।

नेल्सन मंडेला केंद्र में रहते हुए प्रो. रिजवी ने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को दुनिया को समझने की दृष्टि दी। उन्होंने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में संघर्ष और शांति जैसे विषयों पर स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के लिए नए पाठ्यक्रम तैयार किए। यह बताता है कि वे केवल बने-बनाए पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं हैं, बल्कि शिक्षा को समय की जरूरतों से जोड़ने वाले अकादमिक योजनाकार भी हैं।

शोध निर्देशन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनके निर्देशन में तीन शोधार्थी पीएच.डी. पूरी कर चुके हैं और सात शोधार्थी संघर्ष, शांति, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका तथा राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक विकास जैसे विषयों पर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अठारह स्नातकोत्तर शोध-प्रबंधों का भी मार्गदर्शन किया है। एक सच्चा शिक्षक वही होता है जो केवल स्वयं आगे नहीं बढ़ता, बल्कि अपने विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भी रास्ते बनाता है। इस दृष्टि से प्रो. रिजवी ज्ञान की अगली पीढ़ी तैयार करने वाले मार्गदर्शक हैं।

जामिया में उनकी प्रशासनिक यात्रा भी बहुत महत्वपूर्ण रही है। वे वरिष्ठ वार्डन रहे, वार्डनों की टीम का नेतृत्व किया, बोर्ड ऑफ स्टडीज, कमेटी ऑफ स्टडीज, सेंटर रिसर्च कमेटी, बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट और आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहे। वे नेल्सन मंडेला केंद्र की लाइब्रेरी से भी जुड़े रहे और परीक्षा संबंधी जिम्मेदारियाँ भी निभाईं। इन अनुभवों ने उन्हें विश्वविद्यालय की आंतरिक संरचना को बहुत करीब से समझने का अवसर दिया।

वरिष्ठ वार्डन और वार्डन टीम के नेतृत्व जैसी जिम्मेदारियों ने उन्हें विद्यार्थियों की वास्तविक समस्याओं से जोड़ा। हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थी केवल पढ़ाई की चिंता नहीं करते, बल्कि सुरक्षा, सुविधा, परीक्षा, अनुशासन और मानसिक दबाव जैसी अनेक स्थितियों से गुजरते हैं। ऐसे वातावरण में काम करने वाला प्रशासक विद्यार्थियों की जरूरतों को कागज से नहीं, जीवन से समझता है। यही संवेदनशीलता आगे चलकर उनके प्रशासनिक व्यक्तित्व में भी दिखाई देती है।

12 मार्च 2025 को प्रो. एम. डी. महताब आलम रिजवी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के नियमित रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार संभाला। यह जामिया के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था, क्योंकि विश्वविद्यालय को चार वर्ष से अधिक समय के बाद पूर्णकालिक नियमित रजिस्ट्रार मिला। जामिया जैसे बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार का पद केवल एक कार्यालयी पद नहीं होता, बल्कि पूरे संस्थान की व्यवस्था, अनुशासन, समन्वय और गति का केंद्र होता है।

रजिस्ट्रार के रूप में प्रो. रिजवी की पहचान एक गंभीर, सजग और अनुशासनप्रिय प्रशासक के रूप में बन रही है। वे छोटी से छोटी प्रशासनिक प्रक्रिया पर ध्यान देने वाले अधिकारी माने जाते हैं। उनकी कार्यशैली में स्पष्टता, समयबद्धता और जवाबदेही दिखाई देती है। वे किसी मामले को केवल फाइल के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसके प्रभाव को भी समझते हैं। प्रशासन उनके लिए केवल आदेश जारी करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को सही रूप में जमीन पर लागू करना है।

उनकी सख्ती को भी इसी दृष्टि से समझना चाहिए। वे सख्त प्रशासक अवश्य हैं, लेकिन उनकी सख्ती का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि कार्य-संस्कृति को मजबूत करना है। किसी भी बड़े विश्वविद्यालय में यदि फाइलें लंबित रहें, निर्णय समय पर न हों, परीक्षाएँ देर से हों, परिणाम अटकें या विभागों के बीच समन्वय कमजोर हो, तो सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों और संस्थान की छवि को होता है। प्रो. रिजवी इसी बात को समझते हैं और इसलिए वे अनुशासन को विकास का आधार मानते हैं।

उनके व्यक्तित्व का मानवीय पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे विद्यार्थियों की परेशानियों को केवल आवेदन-पत्रों की तरह नहीं देखते, बल्कि उन्हें भविष्य से जुड़ी चिंताओं के रूप में समझते हैं। किसी विद्यार्थी का परिणाम समय पर आना, प्रमाणपत्र समय पर मिलना, परीक्षा संबंधी समस्या का समाधान होना, प्रवेश या छात्रवृत्ति से जुड़ा कार्य अटकना नहीं—ये बातें कागज पर छोटी लग सकती हैं, लेकिन विद्यार्थी के जीवन में इनका बहुत बड़ा महत्व होता है। एक संवेदनशील प्रशासक वही होता है जो इन बातों की गंभीरता समझे।

इसी प्रकार कर्मचारी भी किसी विश्वविद्यालय की रीढ़ होते हैं। शिक्षक, गैर-शिक्षक कर्मचारी, प्रशासनिक अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी और कार्यालयों में काम करने वाले लोग मिलकर ही संस्थान को चलाते हैं। प्रो. रिजवी की कार्यशैली में कर्मचारियों के प्रति भी समझ और संवेदनशीलता दिखाई देती है। वे जानते हैं कि यदि कर्मचारी सम्मान, स्पष्ट निर्देश और व्यवस्थित वातावरण में काम करें, तो संस्था की कार्यक्षमता अपने-आप बढ़ती है। अनुशासन और मानवीय दृष्टि का यही संतुलन एक अच्छे प्रशासक को अलग पहचान देता है।

प्रो. रिजवी की भूमिका केवल रजिस्ट्रार कार्यालय तक सीमित नहीं है। रजिस्ट्रार कार्यालय परीक्षा विभाग, वित्त विभाग, नियुक्ति प्रक्रिया, निर्माण कार्य, अनुदान, प्रशासनिक पत्राचार और विभागीय समन्वय को एक साथ जोड़ने वाला केंद्र होता है। वे इस पूरी व्यवस्था को एक मजबूत धारा में बदलने की कोशिश करते हैं। वे समझते हैं कि बड़ा संस्थान तभी आगे बढ़ता है, जब उसके सभी हिस्से एक-दूसरे से जुड़े होकर काम करें।

उनकी कार्यशैली में टीम भावना भी दिखाई देती है। एक अच्छा प्रशासक केवल स्वयं निर्णय लेने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह योग्य अधिकारियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ मिलकर व्यवस्था को आगे बढ़ाता है। प्रो. रिजवी यह समझते हैं कि मजबूत प्रशासन व्यक्ति-आधारित नहीं, बल्कि व्यवस्था-आधारित होना चाहिए। जब व्यवस्था मजबूत होती है, तब संस्थान केवल आज नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों तक लाभ उठाता है।

प्रो. रिजवी की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूत पहचान है। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद में विजिटर के नामित सदस्य हैं। वे दिल्ली एजुकेशन सोसाइटी की गवर्निंग बॉडी के उपाध्यक्ष हैं और उसी सोसाइटी के सदस्य भी नामित हैं। वे बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय, राजौरी की अकादमिक काउंसिल में कार्यकारी परिषद के नामित सदस्य हैं। मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद और एम.आई.टी. वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, पुणे जैसी संस्थाओं की शैक्षणिक समितियों से भी उनका जुड़ाव रहा है। ये जिम्मेदारियाँ बताती हैं कि उनकी विद्वता और प्रशासनिक समझ पर अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों ने भरोसा किया है।

अगस्त 2025 से वे नेपाल के लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। यह उपलब्धि उनके व्यक्तित्व को एक अंतरराष्ट्रीय आयाम देती है। शांति, कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग और सतत विकास जैसे विषयों से उनका जुड़ाव यह दर्शाता है कि उनकी सोच किसी एक विश्वविद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। वे ज्ञान को सीमाओं से परे ले जाने वाले विद्वान हैं।

उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों, व्याख्यानों और शैक्षणिक आयोजनों में संयोजक, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि और वक्ता के रूप में भूमिका निभाई है। दारा शिकोह पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, भारत और मध्य एशिया पर सम्मेलन, हिंद महासागर और हिमालय क्षेत्र से जुड़े कार्यक्रम, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक कूटनीति, भारत-नेपाल संबंध, भारत-ईरान सहयोग, पश्चिम एशिया, शांति अध्ययन और बुद्ध के विचारों पर आधारित वैश्विक शांति जैसे विषयों पर उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। यह बताता है कि वे केवल कार्यालय तक सीमित प्रशासक नहीं हैं, बल्कि निरंतर सक्रिय रहने वाले बौद्धिक व्यक्तित्व हैं।

सार्वजनिक विमर्श में भी प्रो. रिजवी की आवाज सुनी जाती रही है। ईरान, पश्चिम एशिया, खाड़ी क्षेत्र, भारत-ईरान संबंध, इराक संकट, आई.एस.आई.एस., ईरान के परमाणु समझौते और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर उनके विचार अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सामने आए हैं। अल-जजीरा, स्विस नेशनल पब्लिक रेडियो, एबीपी न्यूज, दूरदर्शन, राज्यसभा टीवी, लोकसभा टीवी, आकाशवाणी, बीबीसी और अन्य मंचों पर उनकी उपस्थिति यह दिखाती है कि उनकी विशेषज्ञता को कक्षा, शोध और मीडिया—तीनों जगह महत्व मिला है।

जामिया के वर्तमान दौर में कुलपति प्रो. मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रो. महताब आलम रिजवी की संयुक्त भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। किसी भी विश्वविद्यालय की सफलता के लिए दिशा और क्रियान्वयन दोनों आवश्यक होते हैं। कुलपति विश्वविद्यालय को व्यापक शैक्षणिक दृष्टि देते हैं और रजिस्ट्रार उस दृष्टि को प्रशासनिक धरातल पर लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही संतुलन किसी भी बड़े संस्थान को नई ऊर्जा देता है।

आज उच्च शिक्षा संस्थानों के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल प्रशासन, पारदर्शिता, शोध की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विद्यार्थी-केंद्रित व्यवस्था, समय पर परीक्षाएँ, समय पर परिणाम, संसाधनों का बेहतर उपयोग और संस्थागत जवाबदेही—ये सभी विषय बहुत महत्वपूर्ण हो चुके हैं। ऐसे समय में प्रो. रिजवी जैसे अनुभवी और अनुशासनप्रिय रजिस्ट्रार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे अकादमिक दुनिया को भी समझते हैं और प्रशासनिक जरूरतों को भी।

प्रो. रिजवी की यात्रा युवाओं के लिए यह संदेश देती है कि जीवन में ऊँचा उठने के लिए शोर नहीं, श्रम चाहिए। पहचान बनाने के लिए दिखावा नहीं, गहराई चाहिए। पद पाने के लिए केवल इच्छा नहीं, तैयारी चाहिए। और किसी बड़े संस्थान में जिम्मेदारी निभाने के लिए केवल अधिकार नहीं, बल्कि धैर्य, समझ, संवेदनशीलता और ईमानदारी चाहिए।

उनका जीवन यह भी बताता है कि ज्ञान और प्रशासन दो अलग रास्ते नहीं हैं। जब ज्ञान वाला व्यक्ति प्रशासन में आता है, तो वह व्यवस्था को केवल नियमों से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी देखता है। प्रो. रिजवी विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों की जरूरतों को इसलिए बेहतर समझ सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं इसी शैक्षणिक परंपरा से निकले हैं।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पद को केवल प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानते हैं। रजिस्ट्रार का कार्यालय विश्वविद्यालय की धड़कन की तरह होता है। यदि यह कार्यालय समय पर, पारदर्शी और व्यवस्थित ढंग से काम करे, तो पूरे विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है। प्रो. रिजवी की सजगता और सक्रियता इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पहचान शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जिम्मेदारी और बौद्धिक स्वतंत्रता से जुड़ी रही है। प्रो. रिजवी इसी परंपरा को प्रशासनिक स्तर पर आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। वे जामिया की विरासत को समझते हैं, वर्तमान प्रशासनिक चुनौतियों को पहचानते हैं और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य-संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

कुल मिलाकर, प्रो. एम. डी. महताब आलम रिजवी का व्यक्तित्व ज्ञान, मेहनत, अनुशासन और जिम्मेदारी की लंबी यात्रा का परिणाम है। वे गंभीर शोधकर्ता हैं, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हैं, शिक्षक हैं, मार्गदर्शक हैं, आयोजक हैं, शैक्षणिक योजनाकार हैं और एक ऐसे रजिस्ट्रार हैं जो प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत, समयबद्ध और परिणामोन्मुख बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

उनकी कहानी यह विश्वास दिलाती है कि जब विद्वता, अनुशासन, ईमानदारी और संस्थान-प्रेम एक साथ मिलते हैं, तो व्यक्ति केवल पद तक नहीं पहुँचता, बल्कि संस्था के भविष्य को आकार देने में भी भूमिका निभाता है। प्रो. रिजवी की यात्रा उन विद्यार्थियों, शोधार्थियों और युवाओं के लिए प्रेरणा है जो मानते हैं कि मेहनत, ज्ञान और धैर्य के बल पर जीवन में बड़ी ऊँचाइयाँ प्राप्त की जा सकती हैं।

जामिया जैसे ऐतिहासिक केंद्रीय विश्वविद्यालय में उनका रजिस्ट्रार बनना केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए स्थिरता, ऊर्जा और उम्मीद का संकेत भी है। उनकी यात्रा यह सिखाती है कि साधारण शुरुआत से भी असाधारण स्थान तक पहुँचा जा सकता है, बशर्ते व्यक्ति ज्ञान को अपना आधार, अनुशासन को अपना स्वभाव और जिम्मेदारी को अपना धर्म बना ले।