Type Here to Get Search Results !

JAUNPUR NEWS : केवट के प्रेम, महर्षि वाल्मीकि के मार्गदर्शन और चित्रकूट में प्रभु श्रीराम की भावुक लीला का मार्मिक मंचन हुआ

जौनपुर। नगर के.बीआरपी इंटर कॉलेज के प्रांगण में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह जी द्वारा आयोजित नव दिवसीय श्री राम कथा के सातवें दिन कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने रामबाण गमन यात्रा के प्रसंग में कहा की। 

भगवान को धन-दौलत नहीं, भक्त का निर्मल प्रेम प्रिय है; केवट की भक्ति ने श्रीराम को भी अपना ऋणी बना लिया।

श्रीराम कथा में केवट संवाद का प्रसंग भक्ति, प्रेम, समर्पण और निष्काम सेवा का अनुपम उदाहरण है। जब प्रभु श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण गंगा नदी पार कर दूसरी ओर पहुँचे, तब माता सीता ने भगवान को उतराई देने के लिए अपनी अंगूठी निकालनी चाही। लेकिन केवट ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक उतराई लेने से मना कर दिया।

केवट ने प्रभु श्रीराम से कहा, “हे प्रभु!

 मल्लाह कभी मल्लाह से उतराई नहीं लेता। एक मल्लाह दूसरे मल्लाह से क्या लेगा?

 मैं इस घाट का सेवक हूँ और आपको गंगा पार उतारने का सौभाग्य मिला है। मैंने आपको इस नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचाया है। प्रभु, आप भवसागर के खेवैया हैं। जब मेरी बारी आए, तब आप मुझे भी इस संसार रूपी भवसागर से पार उतार दीजिएगा।”

केवट की यह बात सुनकर प्रभु श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए। उसकी भक्ति और निष्कपट प्रेम ने सभी को भावविभोर कर दिया। केवट का उद्देश्य धन कमाना नहीं, बल्कि प्रभु की सेवा करना और उनका सान्निध्य प्राप्त करना था।

 केवट ने प्रभु श्रीराम के चरण पखारकर उनके चरणामृत को स्वयं ग्रहण किया और अपने परिवार को भी पिलाया। उसकी दृष्टि में भगवान के चरणों का जल संसार के सभी सुखों और संपत्तियों से बढ़कर था।

कथावाचक ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि जो भक्त भगवान से किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं रखता और केवल प्रेम तथा समर्पण से उनकी सेवा करता है, भगवान भी उसके प्रेम के ऋणी हो जाते हैं। प्रभु को सोने-चाँदी की भेंट से अधिक भक्त का निर्मल हृदय प्रिय है।

महर्षि भारद्वाज से मार्गदर्शन

गंगा पार करने के बाद प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी महर्षि भारद्वाज के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं। आश्रम पहुँचकर भगवान ने महर्षि को प्रणाम किया और उनसे वन में आगे जाने का मार्ग पूछा।

श्रीराम ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे महर्षि! मुझे पिता की आज्ञा के अनुसार चौदह वर्ष का वनवास बिताना है। कृपया मुझे ऐसा स्थान बताइए, जहाँ मैं माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ रह सकूँ। महर्षि भारद्वाज ने प्रभु का स्वागत किया और उन्हें वन के मार्ग तथा उपयुक्त स्थानों के बारे में बताया। आश्रम में रहने वाले शिष्यों को जब प्रभु श्रीराम के आगमन का समाचार मिला, तो वे उनके दर्शन के लिए उत्सुक हो उठे। सभी ने प्रभु के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना।

इसके बाद प्रभु श्रीराम ने महर्षि भारद्वाज से विदा ली और महर्षि वाल्मीकि के आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

महर्षि वाल्मीकि से चित्रकूट का मार्ग

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में प्रभु श्रीराम के पहुँचते ही वहाँ आनंद का वातावरण छा गया। महर्षि ने भगवान का आदरपूर्वक स्वागत किया। प्रभु श्रीराम ने उन्हें अयोध्या की परिस्थितियों, पिता की आज्ञा और वनवास के विषय में बताया।

महर्षि वाल्मीकि ने कहा कि प्रभु, आपके विषय में मुझे सब ज्ञात है। आप धर्म के रक्षक और संसार के कल्याण के लिए अवतरित हुए हैं। फिर भी आपने मर्यादा का पालन करते हुए पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना है।

प्रभु श्रीराम ने महर्षि से पूछा, “हे गुरुदेव! वनवास के चौदह वर्ष बिताने के लिए मुझे किस स्थान पर निवास करना चाहिए?”

महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें चित्रकूट जाने का सुझाव दिया। चित्रकूट की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण, वन-संपदा और मंदाकिनी नदी का पवित्र तट तपस्या एवं वनवास के लिए उपयुक्त था। महर्षि के मार्गदर्शन को स्वीकार कर प्रभु 

श्रीराम ने चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया।

चित्रकूट में प्रभु श्रीराम की भावुक लीला

चित्रकूट पहुँचकर प्रभु श्रीराम ने मंदाकिनी नदी के सुंदर तट और वन की शांति को देखा। चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य था। मंदाकिनी की कलकल ध्वनि, वृक्षों की शीतल छाया और वन का एकांत वातावरण मन को शांति प्रदान कर रहा था।

लेकिन इस शांत वातावरण के बीच प्रभु श्रीराम के हृदय में माता-पिता से बिछड़ने का दुःख उमड़ पड़ा। अयोध्या की यादें, माता कौशल्या का स्नेह, पिता महाराज दशरथ का वात्सल्य और परिवार से दूर होने की पीड़ा उनके मन को व्याकुल करने लगी।

, प्रभु श्रीराम एकांत में एक शिला पर बैठ गए। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे अपने माता-पिता को याद कर भावुक हो उठे। उन्होंने सोचा कि कहीं माता सीता और लक्ष्मण उनकी इस मनोदशा को देखकर चिंतित न हो जाएँ, इसलिए वे कुछ समय एकांत में बैठकर अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करने लगे।

भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में पुत्र धर्म, भ्रातृ प्रेम, पति धर्म और मानवीय संवेदनाओं का आदर्श प्रस्तुत किया। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राजमहल का सुख छोड़ देना और वन में रहकर भी माता-पिता के प्रति प्रेम बनाए रखना उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है।

इस कथा के प्रसंग सुनने के लिए विशिष्ट अतिथि अंगराज सिंह प्रान्त प्रचारक, मुरली पाल जी प्रांत कार्यवाहक, रजत जी जिला प्रचारक मिर्जापुर, कमला सिंह पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष, अनिल कुमार शाही कुश्ती महासंघ उपाध्यक्ष, सत्य प्रकाश सिंह प्रबंधक टीडी इंटर कॉलेज, जय सिंह अन्ना समाजसेवी, भुनेश्वर सिंह, अमित सिंह बाबी,दीपक सिंह, शिवा सिंह,सुमित सिंह आशुतोष कुमार बबलू, आज आलोक उपस्थित रहे

Tags

Top Post Ad

Below Post Ad