जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज प्रांगण में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन पूज्य शांतनु जी महाराज ने राम-भरत मिलाप के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने भाइयों के बीच प्रेम, त्याग, समर्पण और मर्यादा के महत्व को रेखांकित किया। राम-भरत मिलाप का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे।
शांतनु जी महाराज ने कहा कि जब भगवान श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए चले गए, तब उनके वियोग में महाराज दशरथ ने प्राण त्याग दिए। उस समय भरत जी अपने ननिहाल में थे। पिता के निधन और श्रीराम के वनवास की सूचना मिलने पर वे तत्काल अयोध्या लौटे। जब उन्हें पूरी घटना का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने माता कैकेयी से कहा कि मां, आपने पिता जी से ऐसा वरदान क्यों मांगा, जिसके कारण मेरे प्रिय बड़े भाई श्रीराम को वन जाना पड़ा? भरत जी पिता की मृत्यु और भाई के वियोग से व्याकुल होकर फूट-फूटकर रोने लगे।
इसके बाद भरत जी ने श्रीराम को वापस अयोध्या लाने का संकल्प लिया। वे गुरुजनों, मंत्रियों, माताओं और अयोध्या के अनेक लोगों के साथ वन की ओर चल पड़े। उनका उद्देश्य राज्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई को वापस लाकर अयोध्या का राजसिंहासन सौंपना था।
लक्ष्मण जी को हुआ संदेह, श्रीराम ने समझाया भाई के प्रेम का महत्व
जब लक्ष्मण जी ने भरत को विशाल सेना के साथ अपनी ओर आते देखा, तो उन्हें संदेह हुआ कि कहीं भरत राज्य की सत्ता अपने हाथ में रखने के लिए तो नहीं आ रहे हैं। लक्ष्मण जी क्रोधित हो उठे, लेकिन भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाया कि भरत के हृदय में हमारे प्रति अपार प्रेम है। वे हमसे मिलने और हमें वापस ले जाने के लिए आ रहे हैं। श्रीराम के समझाने पर लक्ष्मण जी शांत हो गए।
जैसे ही भरत जी की दृष्टि श्रीराम पर पड़ी, वे दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े। दोनों भाइयों के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। श्रीराम ने भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों के इस मिलन को देखकर वहां उपस्थित गुरुजन, माताएं और अन्य लोग भी भावुक हो उठे। यह दृश्य त्याग, प्रेम और पारिवारिक संबंधों की गहराई का अनुपम उदाहरण बन गया।
श्रीराम ने पिता के वचन को सर्वोपरि बताया
भरत जी ने श्रीराम से अयोध्या लौटने की बार-बार विनती की। उन्होंने कहा कि आपके बिना अयोध्या सूनी है और राज्य का संचालन आपके बिना संभव नहीं है। आप वापस चलकर राजपाट संभालिए। लेकिन श्रीराम ने भरत को समझाया कि पिता महाराज दशरथ ने उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया है और पिता के वचन का पालन करना उनका धर्म है। वे किसी भी परिस्थिति में पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते।
भरत जी ने अपने बड़े भाई की मर्यादा और धर्मनिष्ठा का सम्मान किया, लेकिन उनका हृदय श्रीराम के बिना अयोध्या लौटने को तैयार नहीं था। अंततः उन्होंने श्रीराम से उनकी चरण पादुका मांगी। श्रीराम ने अपनी चरण पादुका भरत जी को सौंप दी। भरत जी ने उसे श्रद्धापूर्वक अपने सिर पर धारण किया और अयोध्या लौटने का निर्णय लिया।
नंदीग्राम में चरण पादुका स्थापित कर भरत ने निभाया त्याग और समर्पण का धर्म
अयोध्या लौटने के बाद भरत जी ने श्रीराम की चरण पादुका को राजसिंहासन पर स्थापित किया। उन्होंने स्वयं राजा के रूप में सुख-सुविधाओं का उपभोग करने के बजाय नंदीग्राम में रहकर तपस्वी जीवन बिताने का संकल्प लिया। वे श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य के कार्यों का संचालन करने लगे और चौदह वर्षों तक अपने बड़े भाई की वापसी की प्रतीक्षा करते रहे।
भरत जी ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए राजसत्ता से अधिक महत्वपूर्ण बड़े भाई का सम्मान और पिता की आज्ञा का पालन है। उन्होंने राजमहल के सुखों को त्यागकर अपने जीवन को श्रीराम के प्रति समर्पित कर दिया। कथा मे आये गण मान्य सदस्य उपस्थित रहे रीता बहुगुणा, धन्यजय सिंह पूर्व सांसद, साधना सिंह राज्य सभा सांसद चंदौली, अमरजीत सिंह मुंबई, हरिकेश प्रताप सिंह जगदम्बा पाल रजनीकांत तिवारी, अरुण प्रजापति प्रधान चंदौली, प्रमोद सिंह चंदौली, बृजेश सिंह कर्मचारी संघ, संतोष सिंह सत्या विकास सिंह, रोहित सोलंकी, संजीव सिंह काशी, अभिषेक शुक्ला, भुनेश्वर सिंह दीपक सिंह, सुनील सिंह, आसुतोष सिँह बब्लू आदि लोग उपस्थित रहे।
