जौनपुर। नगर के विवाह मैरेज लॉन में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथाव्यास पं. रजनीकांत द्विवेदी ने कौरव-पांडव युद्ध और अश्वत्थामा सहित कई प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति हर परिस्थिति में दयालुता और संतोष का भाव रखता है, उस पर भगवान नारायण की कृपा बनी रहती है। कलियुग में लोग मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के पीछे परेशान हैं। परमात्मा की कथा सुनने के लिए सत्संग और अच्छे विचार जरूरी हैं।
कथाव्यास ने बताया कि कौरव-पांडव युद्ध के बाद सभी कौरव मारे जा चुके थे और दुर्योधन जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था। उसकी पीड़ा देखकर बचपन के मित्र अश्वत्थामा ने पांडवों को मारने का संकल्प लिया। असफल होने पर उसने पांडवों के पांच पुत्रों की हत्या कर उनके सिर दुर्योधन के सामने रख दिए। यह देखकर दुर्योधन भी विचलित हो उठा और उसे लगा कि अश्वत्थामा ने कौरव वंश के चिराग बुझा दिए। अंततः दुर्योधन ने तड़पते हुए प्राण त्याग दिए। महाराज ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से अश्वत्थामा के दंड के बारे में पूछा तो उन्होंने उसे जीवित छोड़ने की बात कही। इसके बाद श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के माथे से मणि निकाल ली। युधिष्ठिर ने भी उसे गुरु का पुत्र बताते हुए वध करने से इनकार किया। कथाव्यास ने कहा कि पुराणों में बालक की हत्या को गंभीर अपराध बताया गया है।
श्रीमद्भागवत कथा की मुख्य यजमान विमला सेठ हैं। कथा प्रारंभ होने से पहले विवेक सेठ और विनीत सेठ ने व्यासपीठ की आरती उतारकर कथाव्यास से आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष दिनेश टंडन, सोमेश्वर केसरवानी, अमित त्रिपाठी, रामदयाल द्विवेदी, लोलारक दुबे, नन्हे लाल वर्मा, विभाग प्रचारक आदित्य, रजनीश जी, महेंद्र जी, सत्येंद्र जी, सुरेश तिवारी, विवेक पाठक, विशाल सेठ, विपिन सेठ, हर्षित सेठ, हार्दिक सेठ समेत गठना कोठी परिवार के सदस्य शीतला धाम के महंत विनय त्रिपाठी और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
